” LUDO “

Ludo happened to be
an amazing game in lockdown ,
All over the games
It wore the winning crown .
Young generation thought
That it’s their cup of tea ,
But they don’t know
It is everybody’s childhood memory .
It was designed in India
In 6th century ,
But then the name was Pachisi .
People of each peer group
Revel to play it ,
And it helped
to strengthen the family knit .
All you needed was a number of four
And a same place to play ,
But you can now play with distant people
As now the technology has paved it’s way .
If you have the passion for it
You can even win in cash ,
Online Ludo is more popular
And found its panache .
You can understand
its current position ,
As Bollywood and Anurag basu
is all set for its world wide emission .
An Indian invention
has marked such recognition ,
That the whole world
is having its ADDICTION .

“आज का बच्चा “

दिमाग ने किया एक सवाल ,
क्या है बच्चा ?
हमने कहा ,
जिसका मन है केवल सच्चा,
अनुभवों में जो है कच्चा ,
कभी ना दे जो किसी को गच्चा ,
शायद यही है एक बच्चा !
हां यही है नेक बच्चा ।

पर……

क्या हम नहीं खेल रहे हैं
बच्चों के आने वाले कल से ,
भोले – भाले बचपन को ,
तहस-नहस कर दिया coin master के छल से ,
Pub g की मारधाड़ ने ,
प्रेम – प्यार की बलि चढ़ा दी ,
Mobile , I pad ने परिवार से दूरियां और बढ़ा दीं ,
अंधकारमय इनका भविष्य है ,
हीनता का पुट अवश्य है ,
बौखला गया है आज हर बच्चा ,
कैसे बन पाएगा सच्चा ?
क्योंकि उसने देखा है ,
भ्रष्टाचार का भयंकर तांडव ,
नहीं बन सकता है वो पांडव ,
कृष्ण नहीं है उसके साथ ,
जो सही रास्ता दिखाएं पकड़ कर हाथ ,
गुंडाराज है यहां पर ,
मनुष्य का मूल्य नहीं धरा पर ।

अब….

हमें बचाना है बच्चों को ,
बताना है सही लक्ष्य उनको ,
चलाना है उन्हें एक पथ पर ,
हर नेकी को रहें वो तत्पर ,
कफन भी बांधे अपने सिर पर ,
पडे जब संकट मातृभूमि पर ,
यह संभव होगा तभी ,
प्रेम से मिलजुल कर रहे सभी ,
होगी नहीं जब कोई अड़चन ,
तभी बचेगा कोमल बचपन ,
आओ प्रण यह आज करें हम ,
बच्चों के मार्गदर्शक बने हम ,
जब हर बच्चा उन्नति करेगा ,
भारतवर्ष तभी तो प्रगति करेगा ।

” दिवाली “

” दिवाली आती है , मन में उत्साह जगाती है “

यह एक ऐसा वाक्य है जो हम बचपन से सुनते आ रहे हैं परंतु क्या आज की युवा पीढ़ी दिवाली के लिए उतनी उत्साहित होती है जितनी हम हुआ करते थे ? क्या आज की युवा पीढ़ी दिवाली आने से पहले उसकी तैयारियों में संलग्न होती है ?

इन बातों का केवल एक ही उत्तर है “नहीं ” ।

वह समय अलग था जब दिवाली से जुड़ी प्रत्येक चीज में हर बच्चा उत्साहित होकर अपने मन से आगे रहकर भाग – भाग कर काम किया करता था फिर चाहे दिवाली की सफाई , नए पकवान बनाना हो या विभिन्न प्रकार के नए तरीकों से घर को सजाना हो । मन में एक अलग ही उत्साह होता था जो न तो थकाता था और ना ही आलस्य को पास फटकने देता था । तब दीपावली शुभ हुआ करती थी क्योंकि परिवार का हर सदस्य उसमें बढ़-चढ़कर योगदान दिया करता था । जब परिवार साथ हो तो खुशियां अपने आप ही घर में बिखर जाती हैं । आज शुभ दीपावली केवल व्हाट्सएप मैसेज तक ही सीमित रह गई है । आज की पीढ़ी हर त्यौहार को केवल एक जिम्मेवारी समझ जैसे – तैसे निभाकर मना रही है परंतु पहले किसी भी त्यौहार से ज्यादा मजा उस त्योहार की तैयारी में आया करता था । ना आज की पीढ़ी को दिवाली की सफाई में रुचि है और ना ही उनके पास समय है अपने घर को नाना प्रकार से सजाने का । यह पीढ़ी कुछ ज्यादा ही व्यवहारिक हो गई है और अपने अभिभावकों को भी यही ज्ञान देती हैं कि

” क्या रखा है इन त्योहारों में ? “

इनके लिए दिवाली केवल पूजा और रौशनी का त्योहार है जबकि दिवाली केवल घर में दीपक जलाने का त्यौहार नहीं अपितु यह तो मन में नई खुशियां और उम्मीदों के दीप जलाने का त्यौहार है । जीवन में नई उमंगों का संचार करने का त्यौहार है । सभी त्यौहार मनाने के संस्कार तो परिवार हर संतान को देता है परंतु वह उसे कितना मानती है‌ यह उस पर निर्भर करता है । यदि ऐसा ही चलता रहा तो वह समय ज्यादा दूर नहीं जब दिवाली केवल कैलेंडर लाकर घर में लगाने से मनाई जाएगी । यह ना हो कि आने वाली नई पीढ़ियां दिवाली का महत्व ही भूल जाए यदि ऐसा हुआ तो धर्म के साथ-साथ परंपरा का भी तिरस्कार होगा क्योंकि दिवाली ही एक ऐसा त्यौहार है जो संपूर्ण हिंदू समाज के हर वर्ग में मनाया जाता है । कहीं भगवान राम के अयोध्या लौटने की खुशी में , कहीं भगवान महावीर के निर्वाण की खुशी में और कहीं गुरु हरगोविंद सिंह जी के जेल से आजाद होने की खुशी में ।

इस दिवाली मैं करबद्ध हो अपनी युवा पीढ़ी से आग्रह करूंगी कि अपने मन को टटोलें और अपने परिवार के संस्कारों को जागृत कर उसी प्रकार यह त्यौहार मनाए जैसे बचपन से देखते आ रहे हैं । त्योहारों को व्यवहारिकता के पलड़े में ना तोलें क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो भारत देश की परंपरा धूमिल होकर लुप्त हो जाएगी । नई- पुरानी पीढ़ी के विचारों का समावेश ही भारत की संस्कृति को आगे ले जाने वाला है । यदि भारत का विकास चाहते हो तो पुराने संस्कारों का वहन करना अत्यावश्यक है ।

दिवाली नई वस्तुओं को घर में लाने का त्यौहार भी माना गया है तो चलो इन नए विचारों को अपने मन में लेकर आए और दिवाली को दिवाली की तरह ही मनाएं ।

” मेरी दिवाली , तुम्हारी दिवाली ,
आओ मिलकर मनाए हमारी दिवाली ।। “

” सपने “

क्या आप सपनों को सुन पाते हैं ?
क्या वह आपको कुछ कह पाते हैं ?
जाने मेरे सपनों से क्या नाते हैं ,
वो मुझे बहुत कुछ कह जाते हैं ,
होने वाला अनदेखा बता जाते हैं ,
आने वाली परेशानी से चेता जाते हैं ,
आने वाली खुशियों की झलक दिखला जाते हैं ,
कहते हैं सपने सबको आते हैं ,
पर समझ किसी – किसी को आते हैं ,
लगता है ज्यूं भगवान के इशारे बन जाते हैं ,
कभी-कभी विचलित भी कर जाते हैं ,
अजीब यह है कि इनका आदि और अंत समझ ना आते हैं ,

संबंधित व्यक्ति को पूछने में मन के भाव बहुत सकुचाते हैं ,
पर मन की व्यथा लोग कहां समझ पाते हैं ,
कभी उतावला कभी बेवकूफ कह जाते हैं ,
जब तक समाधान ना निकले अजीब सी बेचैनी भर जाते हैं,
जाने क्यों यह मुझे आकर ऐसे तड़पाते हैं ?
शायद रूह से रूह का रिश्ता समझा जाते हैं ।।

” Independent Women “

Today we Indian ladies are celebrating womenhood in form of Karwachauth and no other day would be more appropriate to give my opinion on the topic “Independent Women “.

Women these days are progressing and trying to build a world that is soothing for their soul.
They are excelling in almost every sector.
They have grown to be more confident than they ever could be before. They know how to achieve their targets despite of endless trolling and judgements. People crib of not trusting women anymore because of their non-traditional behaviour and attitude but being independent doesn’t mean that she has left her values and traditions behind .A woman can balance tradition and modernization efficiently .

Did anyone thought why is this happening ?

Since ages , the society has finalised few norms which everyone used to follow . The major was that man will work outside to earn whereas women are accustomed to do by household chores only . Slowly women learnt that they are not treated equal to men . Being educated made them realised the importance of their own self in their eyes . All the rights were reserved in favour of man and all the decisions of the house were made by him giving least importance to what a woman wants for hesrself and her family just because he is the one who brings bread to the family and look after their financial needs .

Oprah Winfrey once stated ,

” When you undervalue what you do ,
The world will undervalue who you are . “

For eons women didn’t value themselves so the world treated them like a useless doormat . Now as she has learnt her own value she decided to step out of the house to earn some respect for themselves by working in the cut throat competitive world . Society forced women to take such bold steps . Being a homemaker is a thankless job which nobody appreciate . The woman were succumbed when they retaliate . The endless pressures of society made them independent . As they say ,

” To earn respect you should earn money .”

Women have found the right way of prooving themselves that they are multitaskers . They shine in both the places of work whether it’s office or home . Today’s women won’t take the crap easily . They are sufficient to give it back in their own way . They are as soft as snow and at the same time they are as hard as a rock .If you’ll respect them they will melt and if you mess with them they will show you your place . This so called society has been the major factor in the women’s transformation so why they question now ? The humiliation and insecurity faced made women think to be independent .

” त्योहार “

त्योहार लाते हैं जीवन में बहार ,
अपनों से मिलने के मौके बेशुमार ,
दिल खोल कर जताते हैं सब अपना प्यार ,
पर हाय यह महामारी की मार ,
२०२० में पहले से रहे नहीं त्योहार ।

लोहड़ी तक तो सब ठीक था ,
फिर हुआ करोना का वार ,
टूट के बिखर गया सारा संसार ,
होली गई बेरंगी , गया बैसाखी का त्यौहार ,
राखी मनाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर मेरे यार ,
तीज की हरियाली भी देख ना पाए ,
दशहरे में भी सूने पड़े थे बाजार ।

शगुन के सामान खरीदने
बाजार में निकलती थी हर नार
आज घर बैठी है
अपने उत्साहित मन को मार ,
मेहंदी , चूड़ियां , श्रृंगार का सामान ,
रंग – बिरंगे जोड़ों के झिलमिल तार ,
सूने और अनछुए पड़े हैं बीच बाजार ,
पहली बार ऐसे बीतेगा
करवा चौथ का त्यौहार ।

धनतेरस की रौनक पहली सी ना होगी ,
दिवाली भी सूनी – सूनी सी होगी ,
बाजारों में सजावट तो होगी ,
पर निहारने वालों की कमी जरूर होगी ,
गोवर्धन – पूजा का उत्साह ,
भाई – दूज में बहनों की मनुहार ,
यूं ही निकल जाएगी इस बार ।

यूं तो कुछ लोग बाजार में निकलते हैं ,
पर काफी अभी भी झिझकते हैं,
जिन्होंने भोगा है करोना के दुख को ,
घर में सीमित रख रहे वह खुद को ,
मन में केवल एक यही आस ,
सब कुछ ठीक हो जाए आसपास ।

त्योहार तो अगले साल भी आएंगे ,
हम दिल खोल कर खुशियां तब मनाएंगे ,
परिवार की सुरक्षा और सेहत के हम स्वयं है जिम्मेदार ,
परिजनों को देंगे अच्छी सेहत का उपहार ,
अपने – अपने घर में मनाएंगे
सरलता से २०२० के आने वाले त्यौहार ।

” A lake “

A lake is the landscape’s most beautiful and expressive feature as it is earth’s eye looking into which the beholder measures the depth of his own nature . A standstill lake teaches us to be calm and grounded as it leads to the bright and composed future . Lakes are generally found in the humid region likewise amidst humid relations one derives the quietude in life . We must try to be like a hush Lake .

“आंसू “

खारे खारे से आंसू ,
एक सशक्त सहारे आंसू ,
काश तुम बोल पाते ,
मन की गिरह खोल पाते ,
यूं तो अविरल बहते जाते हो ,
हर सुख – दुख में साथ निभाते हो ,
किसी पर हुए अन्याय को सह ना पाते हो ,
मन के कृंदन को तुम्ही तो दर्शाते हो ,
पर कुछ कह क्यों ना पाते हो ?
शोषण हो नारी का या भय हो महामारी का‌ ,
क्यों विव्हल हो जाते हो , आक्रोश बन बह जाते हो ,
आवेश में भी कोने में खड़े सकुचाते हो ,
हिंसा देख घबरा जाते हो ,
नैनों से अटूट रिश्ता निभाते हो ,
ग्लानी हो तो भी आ जाते हो ,
आकर आईना दिखा जाते हो ,
प्रसन्नता में भी आंखें नम कर जाते हो ,
बस मूक खड़े रह जाते हो ,
भावनाओं से गहरा तुम्हारा नाता है ,
क्यों कोई तुम्हें समझ ना पाता है ?
नारी की शक्ति भी हो ,
देवी की भक्ति भी हो ,
पर तुम्हें मिलता सम्मान नहीं ,
तुम्हारी कोई पहचान नहीं ,
इंसान बोल सकता है फिर भी खामोश बैठा है ,
हर जगह होता अन्याय जाने कैसे सहता है ?
तुम बिन बोले सब कह जाते हो ,
शायद इसीलिए आंसू कहाते हो ।