“पिता”

“पिता गीता के वो श्लोक हैं,

जिन्हें पढ़ते तो सब है,

समझते कम है……”

आज मैं आपसे उन्हीं पिता के बारे में बात करूंगी जिनके बारे में बहुत कम कहा जाता है। मां के बारे में तो सभी बात करते हैं। मां पूजनीय है, मां से बढ़कर कोई नहीं , परंतु पिता के अस्तित्व को भी हम नकार नहीं सकते। मां अगर प्यार की बहती नदी है तो पिता उस नदी पर सब्र और शांति का बांध हैं। नदी के प्रवाह में बहना हमें अच्छा लगता है पर बांध की अहमियत तब पता चलती है जब बांध में दरारें पड़ जाती हैं और हम लड़खड़ा जाते हैं।

पिता की डांट उस कड़क चाय के समान है जो हम सुबह पीकर दिन की शुरुआत करते हैं। यदि सुबह की चाय कड़क ना हो तो दिन अच्छा नहीं निकलता, वैसे ही यदि पिता की डांट ना हो तो दिन क्या जिंदगी अच्छी नहीं गुजरती। पिता तो वह आईना है जो हमें हमारा प्रतिबिंब दिखाता है, जो कभी झूठ नहीं बोलता, हमें हमारी कमियां दिखाता है, हमें हमसे मिलवाता है। उनकी डांट और सीख के बिना हम कुछ नहीं कर पाएंगे। वह हमें हवाई जहाज की सैर कराने के लिए मीलों लंबी पैदल यात्रा करते हैं, आज के इस माहौल में अगर पिता घर से बाहर नहीं निकल रहे तो केवल इसलिए कि वह परिवार और बच्चों को सुरक्षित रखना चाहते हैं , अपनी जिंदगी के बारे में तो वो सोचते ही नहीं ,हरआपदा से बच्चों को बचाने वाले पिता ही होते हैं ।पिता नारियल की तरह है अंदर से कोमल और बाहर से सख्त परंतु लाभदायक। वह एक पेड़ की तरह है जो खुद तो वर्षा और कड़कती धूप में खड़ा रहता है पर हमें छाया और रक्षण देता है। वह चंद्र के समान हमें शीतलता प्रदान करते हैं और सूर्य के समान हमें संसार के हर उजाले से अवगत कराते हैं ,परंतु हमें तो सिर्फ उनकी डांट और फटकार दिखाई देती है उनका प्यार और समर्पण नहीं।
वह अपना सुख तो हमसे बांटते हैं पर दुख अंदर ही समेट लेते हैं, जीवन भर हमारे लिए भागदौड़ करते हैं और मृत्यु के बाद भी हमारे लिए बहुत कुछ छोड़ कर जाते है जिससे हमें परेशानी ना हो, हम आराम से जी पाएं।
कहते हैं,
‘इंसान के जाने के बाद ही उसकी कदर होती है’
पिता के होने का महत्व उनसे पूछो जिनके सर पर उनका साया नहीं, जो उनके दो बोल को भी तरसते हैं। उनकी स्थिति बगीचे के उस फूल की तरह है जो बिना माली केे मुरझा जाता है।

मां के बलिदान तो हमें दिखते हैं परंतु पिता के बलिदानों को अनदेखा किया जाता है क्योंकि वह अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पाते उनका प्यार हमारी फरमाइशों को पूरा करने में दिखता है, उनका ध्यान उनकी फटकार में दिखाई देता है पर हम समझ नहीं पाते। पिता हमें केवल नाम नहीं देते अपितु अपना सर्वस्व लुटा देते हैं, उन्हें सिर्फ प्यार और आदर चाहिए अपनी संतान से। वह हमारे बिना कहे हमारी इच्छाऐं पूरी कर देते हैं । हमें भी निस्वार्थ भावना से उनका साथ निभाना चाहिए। आज के युग में हम राम और श्रवण तो नहीं बन सकते पर अपने जन्मदाता के थकते कंधों को सहला सकते हैं, उनके कांपते हाथों को थाम सकते हैं और कह सकते हैं …..हम हैं।

ऋतु..

Published by Beingcreative

A homemaker exploring herself!!

18 thoughts on ““पिता”

  1. Pingback: Ritu jain
  2. आपने बिल्कुल सही कहा है ,पिता का साया हमारे जीवन में ,पेड़ की ठण्डी छाँव की तरह है, जो जीवन की धूप से हमें सुरक्षित रखती है ।👌🏼👌🏼

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