“दक्षिण भारत”

प्यारे दोस्तों आज मैं आपको अपने एक और पहलू से रूबरू कराना चाहूंगी मुझे नाटक लिखना और उसका मंचन करना अति प्रिय है। आज आपके समक्ष प्रस्तुत है एक नाटक , आशा करती हूं मेरे लेख और कविताओं की भांति ही आपको यह पसंद आएगा। इस नाटक के द्वारा मैं किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहती परंतु समाज को एक विषय देना चाहती हूं सोचने के लिए ।

” रावण का स्वप्न “

नैपथ्य में सितार का स्वर , भरतनाट्यम करती कुछ कन्याएं, मंदिर के घंटे और शंख की दिल को मोह लेने वाली मधुर ध्वनी ।

सूत्रधार :::

आप पहुंच गए हैं दक्षिण भारत । हमारे नाटक की मूल पात्र है प्रीति जो बहुत वर्षों से दक्षिण भारत भ्रमण के लिए आना चाहती थी , अब जाकर उसकी इच्छा पूर्ण हुई।

प्रीति :::

वाह ! यह वाकई बहुत सुंदर प्रांत है, यहां कितनी हरियाली है , चारों ओर लहराते वृक्ष सुंदर-सुंदर पौधे और भीनी -भीनी खुशबू मन मोह लेती है। यहां के लोग पढ़ाई को कितना महत्व देते हैं। पढ़े लिखे होने के साथ-साथ यहां हर कोई सेवाभावी भी है। आज तो मैं बहुत थक गई , आपको पता है मैं आज कितने मंदिरों में गई ? अरे मंदिरों से याद आया यहां तो रजनीकांत का भी मंदिर है, एक फिल्म अभिनेता का मंदिर कमाल है !! और तो और पूरे भारतवर्ष में रावण को धिक्कारा जाता है परंतु दक्षिण भारत में रावण की पूजा अर्चना होती है, यहां रावण का मंदिर भी है , आश्चर्य है । कोई रावण की कैसे पूजा कर सकता है ? रावण कभी पूजनीय नहीं हो सकता ! मुझे अब सो जाना चाहिए (सोने का उपक्रम करना)

परंतु बार-बार मेरा ध्यान रावण के मंदिर की तरफ ही जा रहा है , यह बात मानने योग्य है ही नहीं , मैं गाइड की बात क्यों मानूं ? मुझे नहीं जाना रावण के मंदिर , जिसने जाना है जाए मुझे क्या फर्क पड़ता है।

सूत्रधार :::

प्रीति यह सब सोचते सोचते कब गहरी नींद में चली गई उसे पता ही नहीं चला नींद उसकी तब खुली जब उसे अट्टहास की ध्वनि आई ।

“”हा हा हा हा हा हा “”

सूत्रधार :::

प्रीति यह ध्वनि सुनकर पलंग से गिर गई । तभी वह धुंधली आकृति अपनी ओर आते देखती है ।

प्रीति:::

(डरते हुए) कौन है आप ? आप यहां क्या कर रहे हैं ? चले जाइए यहां से वरना मैं शोर मचा दूंगी ।

व्यक्ति :::

(गंभीर स्वर) अरे अरे, डरो मत , शांत हो जाओ मैं तुम्हें हानि नहीं पहुंचाऊंगा ।

प्रीति :::

(डरतेहुए) आखिर तुम कौन हो ? यहां क्या लेने आए हो?

व्यक्ति :::

अरररे , तुम ही तो मुझे याद कर रही थी, मेरे बारे में कितना सोच रही थी ,तुम्हें ज्ञात नहीं जिसके बारे में इतना चिंतन करो वही प्रत्यक्ष आ जाता है । मैं हूं लंकापति रावण ।

प्रीति :::

(घबराते हुए) र र र र रावण, मुझे छोड़ दो , मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? मुझे जाने दो।

रावण :::

डरो मत ।

प्रीति :::

(गुस्से में) तुम जैसे व्यक्ति से डरूं नहीं तो और क्या करूं ? चले जाओ यहां से।

रावण :::

(हैरान होकर) मुझ जैसा व्यक्ति ? मैंने क्या किया ?

प्रीति :::

(गुस्से में) अच्छा तुमने क्या किया ? सीता माता का हरण किसने किया था ? एक नारी का अपमान किसने किया था ?

रावण :::

(शांत स्वर) परंतु उस बात को तो सदियां बीत गईं , तुम आज भी उस बात को लेकर बैठी हो । मुझे तो उसका दंड भी मिल गया ।

प्रीति :::

(गुस्से में) तुमने सीता माता का अपमान किया था तुम्हें कभी इसके लिए माफ नहीं किया जाएगा ।

रावण :::

जब श्रीराम ने मुझे माफ कर दिया तो तुम क्यों नहीं मुझे माफ करोगी ? मैंने देवी सीता का अपहरण जरूर किया था परंतु कभी उनका अपमान नहीं किया। आदर सहित अपने महल की अशोक वाटिका में रखा, कभी अपनी मर्यादा नहीं भूला । मैंने तो यह सब अपनी बहन के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए किया था ।

मुझे एक बात बताओ कि तुम लोग हर वर्ष दशहरे पर मेरा पुतला क्यों जलाते हो ?

प्रीति:::

(निर्णायक स्वर) क्योंकि तुमने घोर पाप किया था ।

रावण :::

मैं मानता हूं मैंने पाप किया किया परंतु इतने वर्षों बाद भी मुझे उसकी सजा मिलती है ।,आज कितने ही लोग नारियों का अपमान करते हैं उनकी इज्जत के साथ खिलवाड़ करते हैं कितनी ही दामिनी और निर्भया मरती हैं परंतु उनके दोषियों को कुछ नहीं कहा जाता , क्यों , आखिर क्यों ?

अरे मैंने तो देवी सीता को कभी स्पर्श भी नहीं किया था , परंतु आज का मानव तो हर मर्यादा लांघ चुका है , स्त्री क्या आज तो वह छोटी-छोटी बालिकाओं को भी नहीं छोड़ता और अपनी हवस मिटाता है , ऐसे लोगों को तुम क्या कहोगी ? इनका पुतला तो नहीं जलाते तुम लोग ! जो मानवता की हर हद पार कर चुके हैं , वह तो तुम्हारी अदालतों से भी बच के निकल जाते हैं । मैंने केवल एक स्त्री का अपहरण किया तो मुझे मार दिया गया, सदियों से तुम लोग मुझे जलाते आ रहे हो । क्या मेरा कसूर आज के इन‌ वहशी दरिंदों से ज्यादा था ? मेरे तो कुल का समूल नाश हो गया परंतु आज के यह दानव तो खुलेआम घूमते हैं ।

प्रीति :::

(हिचकते हुए) हां आप बात तो सही कह रहे हैं , हमने कभी सोचा ही नहीं , आपकी बातें सुनकर तो लगता है कि आपका अपराध इतना बड़ा भी नहीं था ।

रावण :::

(पश्चाताप का स्वर) नहीं , मैं मानता हूं मैंने बहुत भयंकर अपराध किया और मैंने उसकी सजा भी भोगी , अपने वंश को अपनी आंखों के सामने खत्म होते देखा , खून के आंसू रोया मैं , प्रभु राम के हाथों से मुझे मुक्ति मिली , मैं कृतार्थ हो गया जब उन्होंने मेरे अंतिम समय में मुझसे ज्ञान मांगा ।

प्रीति :::

यह तो आप उचित कह रहे हैं , आप तो प्रकांड पंडित थे शायद तभी दक्षिण भारत में आप की पूजा होती है ।

रावण :::

मैं नहीं चाहता लोग मेरी पूजा करें , मैं केवल इतना चाहता हूं कि जो सजा मेरे अपराध की मुझे मिली उससे बड़ी सजा बलात्कारियों को मिलनी चाहिए , जो ना जाने कितनी जिंदगियां तबाह कर बच के निकल जाते हैं । आपको रावण का पुतला जलाने की आवश्यकता नहीं है अपितु उचित न्याय व्यवस्था की आवश्यकता है , नारी को उचित सम्मान देने की आवश्यकता है । अपराधियों के मन में डर पैदा करने की आवश्यकता है ।
आज के रावण को अगर मारना है तो भगवान श्रीराम जैसा होना पड़ेगा । क्या उस योग्य हो ???

नेपथ्य में यह ध्वनि गूंजती रही क्या आप उस योग्य हो? क्या आप राम हो ? क्या आप राम बन सकते हो? प्रीति हड़बड़ा कर उठ गई ।

प्रीति :::

यह कैसा स्वप्न देखा मैंने ? आज मैं रावण की व्यथा को समझ पाई , उन्होंने तो सीता माता का हरण केवल प्रतिशोध लेने के लिए किया था , परंतु आज के अनाचारी तो कुंठित मानसिकता रखने वाले पिशाच हैं , जो संवेदनशून्य हैं , जो यह कुकृत्य अकारण ही करते हैं , क्या ऐसा करने से वह मर्द परिभाषित होंगे ?

सूत्रधार :::

आवश्यकता है श्री राम के पद चिन्हों पर चलने की , न्याय व्यवस्था बदलने की यदि ऐसा हो जाए तो हर नारी सुरक्षित हो जाएगी, जरा विचार कीजिए ।

!! समाप्त !!

Published by Beingcreative

A homemaker exploring herself!!

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