” जीने की कला “

मनुष्य को चाहिए सद्भावना जागृत रखना ,
अपने और परायों के दुख का ध्यान रखना ।
जाने कब टूट जाए भ्रम इस जिंदगी का ,
इसलिए हर किसी को अपना बना के रखना ।
अपने प्रेम से लोगों के दिल जीत कर ,
हर किसी को ह्रदय से लगा कर रखना ।
आती है हमेशा बहार के बाद पतझड़ ,
बुरे दिनों के लिए कुछ फूल खिला कर रखना ।
जाने किस भेस में मिल जाए परमात्मा ,
तुम सब के लिए घर - द्वार खुला रखना ।।

Published by Beingcreative

A homemaker exploring herself!!

12 thoughts on “” जीने की कला “

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