” इस्तेमाल “

एक लेखक के मन में सदा ही उथल-पुथल मची रहती है , भावों और विचारों का आवागमन चलता ही रहता है । आज खुद को हम से संबोधित करने की इच्छा जागृत हुई तो ऐसा ही कर रहे हैं ।

यूं तो हम अक्सर अपने जीवन के अनुभव और प्रसंगों से प्रेरित होकर लेख या कविताएं लिखते रहें हैं परंतु आज का विचार हमारा व्यक्तिगत नहीं है अपितु कई लोगों के मन में यह विचार आता होगा कि उन्हें स्वार्थ वश इस्तेमाल किया जाता है । हम आज अपने जीवन के कुछ प्रसंग आपके साथ सांझा करना चाहते हैं ।

कुछ लोग समाज में या यूं कहें संसार में ऐसे हैं जो केवल अपनी ज़रूरत के हिसाब से किसी से संबंध रखते हैं और कुछ लोग हमारे जैसे होते हैं जो यह जानते हुए भी किसी की मदद करते हैं की उन्हें इस्तेमाल किया जा रहा है । ऐसे लोगों को आप क्या कहेंगे ? जो जानते बुझते अपने साथ ऐसा होने देते हैं । आम भाषा में ऐसे लोगों को बेवकूफ कहा जाता है और मुझे प्रसन्नता हो रही है आप सब को यह बता कर कि ” हां हम एक बेवकूफ हैं । ” यह हमारे लिए नकारात्मक संबोधन नहीं है। हम इसे अपनी प्रशंसा मानते हूं । हमें गर्व है इस बात पर । जानिए कैसे !

बचपन से हमें ऐसे दोस्त और बुद्धिजीवी मिले जो केवल अपने मतलब और काम निकलवाने के कारण हमारा इस्तेमाल करने के लिए हमारे समीप आए । अल्पायु में पिता के देहांत के बाद‌ हम और मां अकेले थे , कोई पुत्र ना होने की वजह से मां के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना हमारा कर्तव्य था जो हम सहर्ष निभा रहे थे । इसी यात्रा में ऐसे बुद्धिजीवियों से हमारा आमना-सामना हुआ । दसवीं कक्षा में हमने गाड़ी चलाना सीख लिया शायद इसी कारण कुछ नए दोस्त बने जो जो हमसे बात भी नहीं करते थे परंतु अब वह कभी हमारे साथ स्कूल जाते कभी बाज़ार और कभी घूमने फिरने और हम ड्राइवर बने उन्हें भ्रमण कराते । नृत्य , गायन और नाटकों में बचपन से ही रुचि होने के कारण युवावस्था में अनेकों बार लोग हमसे इसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए रिश्ते बनाने लगे क्योंकि निशुल्क सेवा किसे अच्छी नहीं लगती । हम ठहरे बेवकूफ सब जानते हुए भी लोगों के झांसे में आते रहे और उन्हें संतुष्टि मिलती रही । विवाह उपरांत हम नए क्षेत्र में पहुंच गए और हमारी कलाएं लोगों के समक्ष उभर कर आने लगीं बस फिर क्या था वही सिलसिला फिर से शुरू हो गया । हम यह नहीं कहते की हर कोई हमें इस्तेमाल करने वाला ही मिला , बहुत से रिश्ते ऐसे मिले जो केवल प्यार और व्यवहार से जुड़े थे । जैसे बगिया में विभिन्न प्रकार के फूल होते हैं उसी की भांति समाज में भी नाना प्रकार के व्यक्ति होते हैं । बच्चों को स्कूल छोड़ने जाना या लाना हो , बाज़ार जाना हो या और कोई काम हो तो हम जैसे बेवकूफ दूसरों की सहायता करने से पीछे नहीं हटते । हमारा उद्देश्य केवल यह होता है कि हम तो जा ही रहे हैं तो दूसरे बच्चों को भी साथ बैठा लिया जाए , यदि बाजार जा रहे हैं तो अड़ोस पड़ोस वालों को साथ ले चले जहां हम कुछ खरीदारी करेंगे वहीं दूसरा भी कर लेगा । हम जैसे लोगों की टैक्सी सर्विस सदा चालू ही रहती है और हमें इसमें आनंद मिलता है परंतु विभिन्न लोगों की विचारधारा में ऐसा करके हम महान बनने का प्रयास कर रहे होते हैं । खैर चलिए आगे बढ़ते हैं दिल्ली महा नगरी को छोड़ जब हम पंजाब के एक शहर में परिवार सहित जीवन की नई पारी खेलने पहुंचे तो नए क्षेत्र में नए लोग भी मिले जो हमारे व्यक्तित्व और गुणों से प्रभावित होकर हमें प्रेम करने लगे और कुछ और‌ बुद्धिजीवी मिले जिन्हें हमारी आवश्यकता थी परंतु हम तो हम हैं , बदल थोड़ी सकते हैं खुद को । अनेकों बार खुद को इस्तेमाल होता देख प्रसन्न होते रहे । अब चाहे लोग हमें डिप्लोमेट , पाखंडी , वर्णसंकर आदि अनेक नामों से बुलाएं परंतु हमें पता है हम वही बेवकूफ हैं जो हर समय हर किसी की भी सहायता के लिए तत्पर है । मिथ्या नहीं कहेंगे कि हमें इन बातों से फर्क नहीं पड़ता , अनेक बार मन विचलित हो उठता है अपने लिए यह शब्द सुनकर , शब्दों के दंश तो हमें भी चुभते हैं परंतु यही सोचते हैं कि भगवान ने हमें योग्य समझकर ऐसा हुनर बख्शा है जिससे हम लोगों के काम आ सकें । मन यही सोच कर आह्लादित हो उठता है कि हम किसी के काम तो आ रहे हैं । काम के लिए ही सही कोई हमें याद तो कर रहा है , वरना इस संसार में अधिकतर व्यक्ति ऐसे हैं जिनके अस्तित्व से भी लोग अनभिज्ञ हैं तो उन्हें स्मरण रखना तो बहुत दूर की बात है ।

चेहरे पर मंद मुस्कान आ जाती है जब लोग यह दर्शाते हैं कि वह हमारे शुभचिंतक हैं , उन्हें यह भ्रम रहता है कि वह हमें कितनी सरलता से मूर्ख बना रहे हैं । जीवन के कटु अनुभवों ने हमें मनुष्य को पहचानने की समझ दी है और हम भलीभांति लोगों की मंशा को समझ भी सकते हैं और देख भी सकते हैं परंतु हमें आत्मिक शांति मिलती है लोगों की किसी भी प्रकार से सहायता करने में । आप इसे हमारी उत्पादन त्रुटि या जन्मसिद्ध अधिकार मान सकते हैं क्योंकि हम ऐसे ही हैं ।

तो क्या हुआ अगर हम किसी के उन्नति करने के शिखर पर पग रखने के लिए सीढ़ी बने , तो क्या हुआ अगर हमारे कारण किसी का काम बन गया , तो क्या हुआ जो हमारी वजह से किसी के चेहरे पर मुस्कान खिली । हमारा अस्तित्व किसी के काम तो आया । उनका कर्म उनके साथ और हमारा हमारे साथ ।
कुछ पंक्तियां समाज के हम जैसे तथाकथित बेवकूफ व्यक्तियों के लिए ।

हम खुश हैं,
कि हमारे कारण कईं लोग आगे बढ़े हैं ,
हम खुश हैं ,
की हम किसी ना किसी के लिए आज भी खड़े हैं ,
हम खुश हैं कि हम किसी की ज़रूरत बन सके ,
हम खुश हैं कि हम किसी के साथ चल सके ,
शुक्रिया उस खुदा का जिसने हमें ऐसा बनाया ,
हर किसी को हमने अपने दिल से लगाया ,
जिसको जितनी ज़रूरत थी उसने उतना जाना हमें ,
अपनी सहूलियत के हिसाब से पहचाना हमें ,
हमारे जैसे बेवकूफ अक्सर होते हैं कम ,
जो किसी की मदद के लिए तैयार रहते हैं हरदम ।

Published by Beingcreative

A homemaker exploring herself!!

9 thoughts on “” इस्तेमाल “

  1. रितु जी बहुत ही सुंदर वर्णन किया है आपने अपनी भावनाओं का, आप अपना कर्म करते रहें ऊपर वाला सब देख रहा है
    Rj

    Liked by 1 person

  2. This is life, as long as what u do so selflessly n so truely, it just doesn’t matter what others say or do, u keep On going with ur lovely soul… never change n that too for selfish people, n the best is don’t get affected by them…… I’ve seen u grow up into a wonderful child with a pure heart of of gold… keep on doing for what u think is the best……rest leave it to God…… Bless u n ur upbringing 🥰🥰

    Liked by 1 person

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