“आंसू “

खारे खारे से आंसू ,
एक सशक्त सहारे आंसू ,
काश तुम बोल पाते ,
मन की गिरह खोल पाते ,
यूं तो अविरल बहते जाते हो ,
हर सुख – दुख में साथ निभाते हो ,
किसी पर हुए अन्याय को सह ना पाते हो ,
मन के कृंदन को तुम्ही तो दर्शाते हो ,
पर कुछ कह क्यों ना पाते हो ?
शोषण हो नारी का या भय हो महामारी का‌ ,
क्यों विव्हल हो जाते हो , आक्रोश बन बह जाते हो ,
आवेश में भी कोने में खड़े सकुचाते हो ,
हिंसा देख घबरा जाते हो ,
नैनों से अटूट रिश्ता निभाते हो ,
ग्लानी हो तो भी आ जाते हो ,
आकर आईना दिखा जाते हो ,
प्रसन्नता में भी आंखें नम कर जाते हो ,
बस मूक खड़े रह जाते हो ,
भावनाओं से गहरा तुम्हारा नाता है ,
क्यों कोई तुम्हें समझ ना पाता है ?
नारी की शक्ति भी हो ,
देवी की भक्ति भी हो ,
पर तुम्हें मिलता सम्मान नहीं ,
तुम्हारी कोई पहचान नहीं ,
इंसान बोल सकता है फिर भी खामोश बैठा है ,
हर जगह होता अन्याय जाने कैसे सहता है ?
तुम बिन बोले सब कह जाते हो ,
शायद इसीलिए आंसू कहाते हो ।

Published by Beingcreative

A homemaker exploring herself!!

5 thoughts on ““आंसू “

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