” दिवाली “

” दिवाली आती है , मन में उत्साह जगाती है “

यह एक ऐसा वाक्य है जो हम बचपन से सुनते आ रहे हैं परंतु क्या आज की युवा पीढ़ी दिवाली के लिए उतनी उत्साहित होती है जितनी हम हुआ करते थे ? क्या आज की युवा पीढ़ी दिवाली आने से पहले उसकी तैयारियों में संलग्न होती है ?

इन बातों का केवल एक ही उत्तर है “नहीं ” ।

वह समय अलग था जब दिवाली से जुड़ी प्रत्येक चीज में हर बच्चा उत्साहित होकर अपने मन से आगे रहकर भाग – भाग कर काम किया करता था फिर चाहे दिवाली की सफाई , नए पकवान बनाना हो या विभिन्न प्रकार के नए तरीकों से घर को सजाना हो । मन में एक अलग ही उत्साह होता था जो न तो थकाता था और ना ही आलस्य को पास फटकने देता था । तब दीपावली शुभ हुआ करती थी क्योंकि परिवार का हर सदस्य उसमें बढ़-चढ़कर योगदान दिया करता था । जब परिवार साथ हो तो खुशियां अपने आप ही घर में बिखर जाती हैं । आज शुभ दीपावली केवल व्हाट्सएप मैसेज तक ही सीमित रह गई है । आज की पीढ़ी हर त्यौहार को केवल एक जिम्मेवारी समझ जैसे – तैसे निभाकर मना रही है परंतु पहले किसी भी त्यौहार से ज्यादा मजा उस त्योहार की तैयारी में आया करता था । ना आज की पीढ़ी को दिवाली की सफाई में रुचि है और ना ही उनके पास समय है अपने घर को नाना प्रकार से सजाने का । यह पीढ़ी कुछ ज्यादा ही व्यवहारिक हो गई है और अपने अभिभावकों को भी यही ज्ञान देती हैं कि

” क्या रखा है इन त्योहारों में ? “

इनके लिए दिवाली केवल पूजा और रौशनी का त्योहार है जबकि दिवाली केवल घर में दीपक जलाने का त्यौहार नहीं अपितु यह तो मन में नई खुशियां और उम्मीदों के दीप जलाने का त्यौहार है । जीवन में नई उमंगों का संचार करने का त्यौहार है । सभी त्यौहार मनाने के संस्कार तो परिवार हर संतान को देता है परंतु वह उसे कितना मानती है‌ यह उस पर निर्भर करता है । यदि ऐसा ही चलता रहा तो वह समय ज्यादा दूर नहीं जब दिवाली केवल कैलेंडर लाकर घर में लगाने से मनाई जाएगी । यह ना हो कि आने वाली नई पीढ़ियां दिवाली का महत्व ही भूल जाए यदि ऐसा हुआ तो धर्म के साथ-साथ परंपरा का भी तिरस्कार होगा क्योंकि दिवाली ही एक ऐसा त्यौहार है जो संपूर्ण हिंदू समाज के हर वर्ग में मनाया जाता है । कहीं भगवान राम के अयोध्या लौटने की खुशी में , कहीं भगवान महावीर के निर्वाण की खुशी में और कहीं गुरु हरगोविंद सिंह जी के जेल से आजाद होने की खुशी में ।

इस दिवाली मैं करबद्ध हो अपनी युवा पीढ़ी से आग्रह करूंगी कि अपने मन को टटोलें और अपने परिवार के संस्कारों को जागृत कर उसी प्रकार यह त्यौहार मनाए जैसे बचपन से देखते आ रहे हैं । त्योहारों को व्यवहारिकता के पलड़े में ना तोलें क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो भारत देश की परंपरा धूमिल होकर लुप्त हो जाएगी । नई- पुरानी पीढ़ी के विचारों का समावेश ही भारत की संस्कृति को आगे ले जाने वाला है । यदि भारत का विकास चाहते हो तो पुराने संस्कारों का वहन करना अत्यावश्यक है ।

दिवाली नई वस्तुओं को घर में लाने का त्यौहार भी माना गया है तो चलो इन नए विचारों को अपने मन में लेकर आए और दिवाली को दिवाली की तरह ही मनाएं ।

” मेरी दिवाली , तुम्हारी दिवाली ,
आओ मिलकर मनाए हमारी दिवाली ।। “

Published by Beingcreative

A homemaker exploring herself!!

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