” आस “

क्या है आस ?
अपनों से अपनत्व का विश्वास
ही जगाता है मन में आस ।

दोस्त से दोस्ती निभाने की आस ,
पति पत्नी में प्रेम की आस ,
माता-पिता से विश्वास की आस ,
ससुराल पक्ष में सम्मान की आस ,
अनकहे रिश्तो में एक मिठास की आस ,
वैचारिक मतभेद होते हुए भी समझने की आस ,
भारत भूमि के सपूतों से भारत माता के सम्मान की आस ,
छिन्न-भिन्न होती दिखे जब भी कोई आस ,

फिर,

अकेलेपन का होने लगता है आभास ,
जब रिश्ते फिरने लगे बदहवास ,
अपनों के विचार ही लगे बकवास ,
सुखमय संबंध भरने लगे ह्रदय में खटास ,
विद्रोह करता है मस्तिष्क और रुंध जाती है हर एक श्वास ,
फिर टूट जाती है जीवन जीने की हर एक आस ।

Published by Beingcreative

A homemaker exploring herself!!

One thought on “” आस “

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