” इंसान का जिस्म “

इंसान का जिस्म क्या है ?जिस पर इतराता है जहां ,बस एक मिट्टी की इमारत ,एक मिट्टी का मकां ,खून तो गारा है इसमेंऔर ईंटे है हड्डियां ,चंद सांसों पर खड़ा है ,यह ख्याली आसमां ,मौत की पुरजो़र आंधीइससे जब टकराएगी ,जितनी भी महंगी हो ये इमारत टूटकर बिखर जाएगी ।